| Tourist Places-Bundi |
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बून्दी शहर के मध्य में स्थित रानी जी की बावडी की
गणना एशिया की सर्वश्रेष्ठ बावडियों में की जाती है। इस अनुपम
बावडी का निर्माण राव राजा अनिरूद्व सिंह की रानी नाथावती ने
करवाया था। कलात्मक बावडी में प्रवेश के लिए तीन द्वार है। बावडी
के जल-तल तक पहुचने के लिए सो से अधिक सीढियों को पर करना होता है।
कलात्मक रानी जी की बावडी उत्तर मध्य युग की देन है। बावडी के
जीर्णोद्वार और चारो ओर उद्यान विकसित होने से इसका महत्व
सैलानियों के बढ गया है। हाल ही में रानी जी की बावडी को एशिया की
सर्वश्रेष्ठ बावडियो में शामिल किया गया है। इसमें झरोखों,
मेहराबों जल-देवताओं का अंकन किया गया है। वर्तमान में रानी जी की
बावडी संरक्षण का जिम्मा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पास
है।
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चौगान दरवाजे के समीप नागर-सागर कुण्ड का मूल नाम गंगासागर और
यमुनासागर है। बून्दी शहर के ह़दय में इस कुण्ड का निर्माण संवत
1942 में रावराजा रामसिंह की रानी चन्द्रभान कंवर ने जन-सेवार्थ
करवाया था। आमजनों को जल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से निर्मित
ये कुण्ड अपने शास्त्र सम्मत स्थापना, संयोजन और तक्ष्ण कला
के लिए अपनी विशिष्ठ पहचान रखता है। लगभग 60 फीट गहरे इन दोनों
कुण्डो की सुन्दरता इनकी सीढियों से है। इसके चारो और संगमरमर की
छतरियों के स्तम्भों पर निर्मित बेलबूटे और गमलों की नक्काशी
बेजोड है। यहां पर गजलक्ष्मी, सरस्वती और गणेश जी की
शास्त्रोंक्त प्रतिमाएं भी स्थापित है।
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तारागढ के आंचल में स्थित चित्रशैली, विशिष्ठ
रंगयोजना, सुन्दर-समुखी नारियों के चित्रण, पष्ठ भूमि में सघन
वन-सम्पदा के आदि के लिए प्रसिद्ध रही है। सन 1660 व 1680 के
आस-पास के कई सुन्दर चित्र यहां पर बने हुए है। चित्रशाला के बाहर
उद्यान व कुण्ड बना हुआ है। कुण्ड के चारों ओर बैठने के चौखाने,
बने हुए है। |
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इस छतरी का निर्माण रावराजा अनिरूद्व सिंह (सन 1681-1695) ने अपने
धाय भाई देवा गुर्जर की याद में सन 1683 में कराया था। कोटा रोड पर
राजकीय महाविद्यालय के सामने रणजीत निवास परिसर में स्थित दो
मंजिला छतरी के 84 खम्भे है तथा चबूतरे के चारों ओर विभिन्न
पशु-पक्षियों, देवी-देवताओं आदि के चित्र पत्थर पर उकेरे गये है।
स्थापत्य व पाषाण कला का यह अदभूत नमूना हैं। इसके आंगन में एक
सुन्दर बगीचा भी स्थित है।
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पर्यटन नगरी बून्दी में तारागढ दुर्ग के नीचे रावला
परिसर (मोतीमहल) राव राजा बहादुर सिंह मेमोरियल म्यूजियम हाल ही
में देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए राजपरिवार द्वारा शुरू किया गया
है। इसी के साथ सदियों को इतिहास आमजन के लिए परदे से बाहर आ गया
है। म्यूजियम परिसर में रियासतकालीन वस्तुओं, शिकार किये हुऐ
शेर, भालू, लोमडी, बन्दूकों, हस्तशिल्पों, कलात्मक वस्तुओं,
सिक्कों को प्रदर्शन के लिए रखा गया है। परिसर को देखने के लिए
राजपरिवार द्वारा शुल्क निर्धारित किया गया है।
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तारागढ से नीचे दायें जाने वाले मार्ग पर नवल सागर झील
स्थित है। कटोरे के आकार की इस झील के पानी में सूर्यास्त के समय
राजमहल की परछाई मन को छू लेती हैं। झील में पानी की आवक के लिए
चारो तरफ पहाडों से नालों के निर्माण रियासत काल से ही किया गया
है। झील के मध्य में वरूण मन्दिर, महादेव मन्दिर स्थित है जो झील
की शोभा बढाते है। झील के एक छोर पर तन्त्र विधा पर आधारित
गजलक्ष्मी की भव्य मूर्ति स्थित है, मान्यता के अनुसार यह
मूर्ति सम्पूर्ण भारत वर्ष में यही पर स्थित है। |
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सुखमहल व जेतसागर झील बून्दी के उतरी द्वार के बाहर
स्थित है- सुखमहल व जैतसागर झील। लगभग 4 किमी लम्बी इस झील में नौका विहार
का आनन्द लिया जा सकता है। इसके एक छोर पर सुखमहल होने से इसकी खूबसूरती
बढ जाती है। सुखमहल का निर्माण राव राजा विष्णु सिंह ने 1773 ई में कराया
था। बून्दी शहर की ओर चलने पर दांयी ओर टेरेस गार्डन बांयी ओर पहाडी पर
मीरा साहब की मजार स्थित है। समय-समय पर झील में विभिन्न प्रतियोगिताएं
आयोजित की जाती है।
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बून्दी
शहर के उत्तर में 1426 फीट उची पहाडी पर तारागढ दुर्ग बना हुआ है। इस
दुर्ग को रावराजा बेरसिंह ने सन
1354 ई में बनवाया था। दुर्ग में चार कुण्ड है जो कि पानी की समस्या को
हल करने के लिए बनवाये गये थे। दुर्ग के मध्य में भीम बुर्ज स्थित है।
विदेशी पत्रकार रिडियार्ड किपलिंग के शब्दों में
‘यह
मानव निर्मित नही बल्कि फरिश्तो द्वारा लगता है’ इसमें हजारी दरवाजा, हाथी पोल, नौ ढाण, रतन दौलत, दरीखाना,
रतन निवास, छत्रमहल, बादल महल, मोती महल, आदि देखने के स्थान है।
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केशवरायपाटन
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धार्मिक आस्था और मन्दिरो की नगरी व बून्दी जिले का दर्शनीय नगर
है केशवरायपाटन ।
बून्दी से 45 किलोमीटर दूर स्थित यह नगर चम्बल नदी के तट स्थित
है1 यहां नवम्बर माह मे कार्तिक पूर्णिमा का भव्य मेला लगता हे।
जिसमे धर्मावलम्बियो की संख्या एक लाख को पार कर जाती है।हजारो
नर-नारी इस पर पवित्र चम्बल नदी मे स्नान करते है।यहां मक्केशाह
बाबा की दरगाह भी धर्मावलम्बियो के लिए आस्था का केन्द्र हैं
।यहां हर वर्ष बून्दी उत्सव के पावन अवसर पर चम्बल नदी के तट पर
सांस्कुतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।इस मेले का महत्व
पुष्कर मेले से कम नही है।
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बून्दी शहर से 5 किलोमीटर दूर हरी-भरी अरावली की तलहटी मे महाराव
राजा उम्मेद सिह ने सन 1713 ई मे अपने पुत्र अजीत सिहं के लिए
गददी छोडकर नगर से दूर तक एकांतवास बनाया था। जिसे शिकार बुर्ज कहा
जाता हैं ।
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बाण-गंगा हिन्दूओ का धार्मिक स्थल है।यहां स्थित
केदारेश्वर मन्दिर का निर्माण हाडा वंश की बून्दी सीपीना के पूर्व का है।
बम्बावदा के राव राजा कोल्हण ने सन
1193 ई के आस पास इस मन्दिर का निर्माण करवाया था । यहां पहाडी पर
से होकर बहने वाले नाले को नदी व
कुण्ड का रूप दिया है। जो इस मन्दिर के किनारे से होकर बहती हैं । और आगे
जाकर जैतसागर झील मे जाकर मिल जाती है। किवंदती के अनुसार पानी की उत्पति
के लिए राव राजा कोल्हण ने भूमि पर बाण मारा था। जिससे निकली पानी की धार
की वजह से इसे बाण गंगा कहा जाता हैं।
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भीमलत महादेव:- भीमलत महादेव (झरना ) बून्दी से
30 किमी दूर चितौड जाने वाले मार्ग पर सुष्टि की
नि:सन्देह सुन्दर कुति है। करीब 60 मीटर की उचाई से जल- प्रपात एक सौम्य
संगीत की उत्पति करता है। सीढियों के जरिये हम वहां पहुंच सकते है, जहां
झरने का जल एकत्रित होकर तालाब का रूप ले लेता है। |
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पश्चिम दिशा मे जब अस्ताचल गामी सूर्य की किरणे किसी मजार को
प्रणाम कर करती है तो याद आता हे नजारा- बाबा मीरा साहब की दरगाह
का।
बून्दी नगर की पूर्वी पहाडी पर निर्मित मीरा साहब की दरगाह प्रथम
दरगाह होने का श्रेय प्राप्त करती है। मीरा साहब के संक्ष्प्ति
नाम से पूजित इस संत की मजार की प्रमुख विशेषता इस पर पांच मीनारो
का निर्माण है। जबकि प्राय: अन्य मजारो पर चार मीनारे होती है।
इसमे पास ही प्राकुतिक जलाशय के साथ ही मध्ययुगीन एक भवन भी बना
है। ईद के पर्व पर यहां भव्य मेला लगता है।
यहां के बारे मे एक कहावत प्रसिद्ध है:-
दारू गोली रंगजी की मदद मीरा साहब |
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